Vegetative Propagation | वानस्पतिक प्रवर्धन की विधियां | Types of Vegetative Propagation in Hindi Detailed information

Plant Propagation Methods

इससे पहले वाले भाग में आपने पढ़ा कि पौध प्रवर्धन (Plant Propagation) क्या है ? पौध प्रवर्धन के प्रकार व पौध प्रवर्धन के प्रकारों के लाभ व हानियां क्या क्या है ?

लेकिन आज आप लोग पढ़ने वाले हैं – वानस्पतिक प्रवर्धन क्या है व वानस्पतिक प्रवर्धन/प्रसारण (Vegetative Propagation in hindi) के प्रकार या वनस्पतिक प्रवर्धन के कितने प्रकार हैं? 

Vegetative Propagation | Types of Vegetative Propagation in Hindi | वानस्पतिक प्रवर्धन की विधियां

 

वानस्पतिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) या Asexual Propagation

 

वानस्पतिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) में बिना बीज की सहायता से नए पौधे तैयार किए जाते हैं । नया पौधा तैयार करने के लिए पौधे के वनस्पतिक भाग जैसे – जड़, तना तथा पत्तियों, आदि का उपयोग किया जाता है । यह विधि बीज द्वारा पौधे उत्पन्न करने की तुलना में उत्तम समझी जाती है । क्योंकि –

● इस विधि से तैयार पौधा दो-तीन साल या उससे भी पहले फल देना प्रारंभ कर देते हैं ।

● इससे तैयार नया पौधा अपने पैतृक वृक्ष के समान गुणों वाला होता है ।

● अपनी इच्छा अनुसार मूलवृन्त (Root Stock)  का उपयोग करके नए पौधे बनाए जा सकते हैं ।

● जो पौधे बीज द्वारा उत्पन्न नहीं किए जा सकते उसे वानस्पतिक प्रवर्धन विधियों द्वारा प्रसारित किया जा सकता है । (बीज रहित पौधे जैसे – केला, अंगूर, अनानास आदि)

● वानस्पतिक प्रवर्धन से तैयार पौधों का आकार छोटा होता है जिससे प्रति हेक्टेयर अधिक पौधे लगाए जा सकते हैं तथा विभिन्न कर्षण क्रियाओं में सुविधा होती है ।

 

वानस्पतिक प्रवर्धन की विधियां (Methods of Vegetative Propagation)

पौध प्रसारण के लिए वानस्पतिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation) की बहुत सारी विधियां हैं, जैसे कर्तन या कलम, ग्राफ्टिंग, लेयरिंग (दाब लगाना) इनार्चिंग, कलिकायन (Budding) इत्यादि ।

 

A. कर्तन या कलम (Cutting)

कर्तन या कलम (Cutting) पौध प्रवर्धन की एक ऐसी विधि है, जिसमें पौधे के किसी वनस्पतिक भाग जैसे – तना, पत्ती, जड़ को उसके पैतृक वृक्ष से अलग करके एक अनुकूल वातावरण में लगा दिया जाता है जिससे यह नए पौधे में विकसित हो जाते हैं ।

कर्तन जड़, तना, पत्ती के अनुसार अलग-अलग होते हैं :-

 

(1) तना कलम (Stem Cutting)

(2) पत्ती कलम (Leaf Cutting)

(3) जड़ कलम (Root Cutting)

 

(1) तना कलम (Stem Cutting) – जैसा कि नाम से ही ज्ञात हो रहा है कि इस कलम में पौधे के तने अथवा शाखाओं को कलम के रूप में पैतृक वृक्ष (parent plant) से अलग करके लगाई जाती है जिसे तना कलम (Stem Cutting) कहते हैं ।

इसे पौधे के अनुसार या लकड़ी की परिपक्वता के आधार पर तीन भागों में बांटा गया है –

(i) कड़ी लकड़ी कलम (Hard wood Cutting) – पतझड़ फल वृक्षों में

(ii) मध्यम कड़ी लकड़ी कलम (Semi Hard wood Cutting) – नींबू वर्गीय पौधे, अनार नाशपाती, अंजीर आदि में सेमी हार्डवुड कटिंग किया जाता है ।

(iii) मुलायम व कोमल लकड़ी कर्तन (Soft wood Cutting) – अमरूद क्रिसेंथिमम आदि ।

 

(2) पत्ती कलम (Leaf Cutting) – जब पौधों के पत्तियों को उसके पैतृक पौधे से अलग करके उसमें जड़ें प्रोत्साहित करने के लिए अनुकूल वातावरण में लगा दिया जाता है, तो इसे ‘Leaf Cutting’ कहते हैं । यह उन पौधों में संभव है जिनकी पत्तियां मोटी व गूदेदार होती है ।

उदाहरण – पत्थरचट्टा, बिगोनिया, लेमन आदि ।

 

(3) जड़ कलम (Root Cutting) – जब कलम के लिए पौधे के जड़ों का प्रयोग किया जाता है तो इसे जड़ कलम (Root Cutting) कहते हैं । यह उन पौधों में किया जा सकता है जो Suckers पैदा करते हैं ।

उदाहरण – नाशपाती, आलूबुखारा, अमरूद सेब, लीची आदि में जड़ कलम द्वारा नए पौधे तैयार किया जा सकता है ।

 

B. ग्राफ्टिंग (Grafting) 

ग्राफ्टिंग (Grafting) पौध प्रसारण कि वह कला और तकनीक है जिसमें एक वयस्क पौधे के शाख (Scion) को अलग कर उसी कुल व उसी मोटाई के दूसरे उगाए गए पौधे (Root Stock) पर बांध दिया जाता है । जिससे यह दोनों अच्छी तरह सम्मिलित होने के बाद एक नए पौधे में विकसित हो जाता है ।

उदाहरण – आम, अमरूद, गुड़हल, लुकाट इत्यादि ।

 

Root Stock – इसे मूलवृन्त कहते हैं, यह ग्राफ्टिंग में जड़ वाली नीचे की आधारीय पौधा है, जिसमे शाख (Scion) को लाकर बांध दिया जाता है ।

Scion – यह ऐच्छिक या चुने गए पौधे की अलग की गई शाखा का टुकड़ा है जिसे मूलवृन्त (Root Stock) के ऊपर बांधा जाता है ।

 

C. लेयरिंग या दाब लगाना (Layering)

जब किसी पौधे के शाखाओं व तनो को उसके मातृ वृक्ष (Mother Plant) से जुड़े रहते हुए किसी माध्यम का प्रयोग करके जड़े उत्पन्न करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है तो इसे लेयरिंग (Layering) या दाब लगाना कहते हैं ।

इसमें जब जड़े निकल जाती है तो उसे मातृ पौधे से अलग कर दूसरे तैयार भूमि में लगा दिया जाता है ।

उदाहरण – अंगूर नाशपाती, सेब, अमरूद, कटहल, नीबू, आम आदि ।

लेयरिंग की दो मुख्य विधियां है –

(¡) गूटी (Gootee or Air Layering) – इसमें पौधे के जमीन से सम्पर्क वाली शाखाओं को मिट्टी में विभिन्न तरीकों से जड़ें निकलने के लिए बाध्य किया जाता है । (उदा. – अमरूद, नाशपाती, अंगूर, सेब इत्यादि)

(¡¡) ग्राउंग लेयरिंग (Ground Layering) – इस विधि में पौधे के ऊपरी चुने हुए शाखाओं पर 2 – 3 सेंटीमीटर छाल को वलयाकार (Ring Form) निकाल कर जड़े निकालने वाली माध्यम को पॉलिथीन की मदद से बांध दिया जाता है । जिसे जड़े निकलने के बाद पैतृक वृक्ष से अलग करके दूसरे खेत में लगा दिया जाता है । (उदा. – कटहल, नींबू वर्गीय पौधे, लीची, आदि)

 

 

D. इनार्चिंग (Inarching)

जिस प्रकार ग्राफ्टिंग में रोपण अथवा मूलवृंत (Root Stock) व शाख (Scion) को बांधने से पहले शाख को पैतृक वृक्ष से काटकर अलग कर दिया जाता है । लेकिन इसमें ऐसा नहीं होता इस विधि में शाख को पैतृक वृक्ष से तब तक अलग नहीं करते जब तक कि रोपण ठीक से सफल नहीं हो पाता ।

चलिये इनार्चिंग को ठीक से समझते हैं – 

=> इनार्चिंग में सबसे पहले मूलवृंत (Root Stock) वाले पौधे को गमलों या क्यारियों में उगा लिया जाता है ।

=> जब यह मूलवृंत रोपण के लायक हो जाता है तो इसे गमले सहित या मिट्टी सहित उखाड़कर ऐच्छिक पैतृक वृक्ष के पास ले जाया जाता है ।

=> अब पैतृक वृक्ष से एक समान मोटाई वाले स्वस्थ शाख (Scion) को चुन लिया जाता है (लेकिन इसे ग्राफ्टिंग की भांति पैतृक वृक्ष से अलग नहीं किया जाता है)

=> इसके बाद मूलवृन्त पर नीचे से लगभग 22 – 23 सेंटीमीटर ऊपर कटान करते हैं । कटान ऐसे करते हैं कि उसके छाल के साथ लकड़ी का भी कुछ भाग कट जाए ।

=> इसी के बराबर कटान चुनी गई शाखा पर भी बनाया जाता है ।

=> तत्पश्चात मूलवृंत को शाखा के पास ले जाकर दोनों को ठीक प्रकार से मिलाकर रोपण पट्टिका से बांध दिया जाता है ।

=> लगभग 2 माह बाद जब रोपण सफल हो जाए तो मूलवृंत को जोड़ (कटान बंधन) से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊपर से काट दिया जाता है ।

=> इसी प्रकार शाख (Scion) को भी जोड़ या कटान बंधन से 15 सेंटीमीटर छोड़कर नीचे से काट दिया जाता है ।

=> अब इस पौधे को छाया में रख देते हैं तथा जब यह खेत में लगाने लायक हो जाए या 1 वर्ष पुराना हो जाए तो मुख्य खेत में जहां लगाना हो लगा दिया जाता है ।

 

E. कलिकायन (Budding)

पौध प्रसारण की इस विधि में पैतृक वृक्ष के चुने हुए स्वस्थ कलिका (Bud) को मूलवृन्त पर तैयार किये गए स्थान पर लगा दिया जाता है। इससे कैम्बियम (Cambium) की दोनों परतें आपस मे मिल जाती है जिससे एक नया पौधा तैयार होता है ।

=> यह क्रिया भूमि से लगभग 22 – 23 सेंटीमीटर ऊपर करना चाहिए ।

=> कलिका को इस प्रकार लगाना चाहिए कि उसका बढ़ने वाला सिरा ऊपर की तरफ रहे तथा कलिका व मूलवृन्त दोनों के कैंबियम की परत (Cambium layers) आपस में अच्छी तरह से मिल जाए ।

=> वह स्थान जहां मूलवृंत पर कलिका को लगाया जाता है उसे ‘मेट्रिक्स’ कहते हैं ।

=> कलिका लकड़ी लगभग 1 मौसम पुरानी व स्वस्थ होनी चाहिए तथा कलिका वाली लकड़ी तथा मूलवृन्त का रंग समान होना चाहिए ।

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Reference :-

उपरोक्त जानकारी हॉर्टिकल्चर की विभिन्न बुक व internet से लिया गया है । तथा हमारे टीम के द्वारा कुछ सुधार व परिवर्तन किया गया है ।

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